दुर्गापुर स्पंदन ने आदिवासियों के बीच मनाई पुण्यतिथि
दुर्गापुर:समय बीतता गया, लेकिन समाज सेवा की जो लौ साधना गांगुली ने जलाई थी, वह आज भी उतनी ही प्रज्वलित है। 16 फरवरी, 2002 को दुर्गापुर की जानी-मानी समाजसेविका और संस्था 'दुर्गापुर स्पंदन' की तत्कालीन संपादिका साधना गांगुली का निधन हुआ था। आज उनके निधन के 24 साल बाद भी उनकी यादों को सेवा कार्यों के जरिए जीवित रखा गया है।हर साल की तरह इस वर्ष भी 'दुर्गापुर स्पंदन' ने इस दिन को हाशिए पर रह रहे लोगों की सेवा के लिए समर्पित किया। पश्चिम बर्धमान जिले के कांकसा थाना अंतर्गत रुपगंज के अराइचांद आदिवासी शिशु शिक्षा केंद्र में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत में साधना देवी के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। श्रद्धा सुमन अर्पित करने वालों तुषार गांगुली,संपादक,दुर्गापुर स्पंदन एवं वरिष्ठ पत्रकार,
काजल चटर्जी,प्रधानाध्यापिका,
अरिणित्र गांगुली,पुत्र, और कंकणा,पुत्रवधू,
पत्रकार सनत बनर्जी और समाजसेवी कंचन राय आदि शामिल थे.कोलकाता के प्रख्यात होम्योपैथी चिकित्सक और 'इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड रिसर्च एंड एजुकेशन' के अध्यक्ष डॉ. अशोक प्रधान ने फोन के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने साधना देवी के समाज के प्रति दृष्टिकोण की सराहना करते हुए 'दुर्गापुर स्पंदन' के प्रयासों को सराहा।इस अवसर पर स्कूल के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा सामग्री की किट और खाद्य सामग्री वितरित की गई। साथ ही, बच्चों के लिए दोपहर के भोजन में विशेष रूप से मांसाहारी व्यंजन और मिठाइयों का प्रबंध किया गया। बच्चों के चेहरों की मुस्कान ने पूरे माहौल को जीवंत कर दिया।अपनी जीवनसंगिनी को याद करते हुए भावुक स्वर में तुषार गांगुली ने कहा साधना ज़ी के निधन के समय मेरा बेटा मात्र 10 वर्ष का था। वह हमारे परिवार पर पहाड़ टूटने जैसा था, लेकिन हमने साहस और ईमानदारी के साथ वापसी की। आज बेटा अपने पैरों पर खड़ा है और साधना के सपनों की संस्था 'स्पंदन' निरंतर सामाजिक कार्य कर रही है।उन्होंने घोषणा की कि अगले वर्ष, साधना देवी की 25वीं पुण्यतिथि (रजत जयंती वर्ष) के अवसर पर संस्था और भी बड़े स्तर पर जन-कल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित करेगी।कांकसा के जंगलों के बीच स्थित इस स्कूल में बच्चों के शोर और उत्साह को देखकर ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति भी इस महान आत्मा को नमन कर रही हो। पक्षियों के कलरव और पेड़ों की सरसराहट से जैसे एक ही स्वर गूँज रहा था— साधना, तुम मरी नहीं हो; तुम आज भी लोगों के दिलों में जीवित हो।
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