नन्हे फरिश्ते बनकर आए आरपीएफ जवान
आसनसोल(तारकेश्वर राय) : रेलवे सुरक्षा बल (RPF) आसनसोल मंडल ने मानवता और सतर्कता का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। 'ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते' के तहत आरपीएफ ने दो मासूम बच्चों को असुरक्षित माहौल से निकालकर उन्हें नई उम्मीद दी है।29 जून को आरपीएफ की दुमका और वेस्ट पोस्ट की टीम रेलवे परिसर में गश्त कर रही थी। इसी दौरान जवानों की नजर एक लड़के और एक लड़की पर पड़ी, जो अकेले थे और काफी डरे-सहमे दिख रहे थे। आरपीएफ जवानों ने बिना समय गंवाए स्थिति को भांप लिया और फौरन उन बच्चों को अपनी सुरक्षा में ले लिया।बच्चे इतने घबराए हुए थे कि वे कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थे। आरपीएफ जवानों ने न केवल धैर्य बनाए रखा, बल्कि उन्हें भोजन और पानी उपलब्ध कराकर एक सुरक्षित और पारिवारिक वातावरण का अहसास कराया। तत्पश्चात, कानूनी औपचारिकताएं पूरी करते हुए दोनों बच्चों को 'चाइल्डलाइन' के सुपुर्द कर दिया गया, ताकि मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग के जरिए उनके घर का पता लगाकर उन्हें माता-पिता से मिलाया जा सके।रेलवे का 'ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते' अभियान लगातार उन बच्चों के लिए देवदूत साबित हो रहा है, जो भटककर या किसी अनहोनी का शिकार होकर रेलवे स्टेशन तक पहुंच जाते हैं। आरपीएफ आसनसोल मंडल के अधिकारियों का कहना है कि उनकी प्राथमिकता न केवल यात्रियों की सुरक्षा है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग—बच्चों और महिलाओं—की रक्षा करना भी उनकी सर्वोच्च जिम्मेदारी है।
अधिकारियों ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि रेलवे परिसर में यदि कोई बच्चा अकेला या संदिग्ध स्थिति में नजर आए, तो तुरंत '139' या नजदीकी आरपीएफ पोस्ट पर संपर्क करें।यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि वर्दी के पीछे एक संवेदनशील इंसान भी होता है। आरपीएफ की इस त्वरित कार्रवाई ने न केवल दो घरों को टूटने से बचाया, बल्कि यह विश्वास भी जगाया है कि रेलवे परिसर में सुरक्षा का पहरा कितना मुस्तैद है। 'नन्हे फरिश्ते' जैसे अभियान सही मायनों में समाज की सेवा का एक सशक्त माध्यम बन चुके हैं, जो निस्वार्थ भाव से अपनों को अपनों से मिलाने का पुण्य कार्य कर रहे हैं।
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