केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल दुर्गापुर में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस के अवसर पर एक वृहद् कार्यक्रम

केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल दुर्गापुर में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस के अवसर पर एक वृहद् कार्यक्रम

दुर्गापुर(अमन राय) दुर्गापुर में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस का आयोजन दिनांक 15/05/2023 को ग्रुप केन्द्र, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल,दुर्गापुर में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस के अवसर पर एक वृहद् कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता ग्रुप केन्द्र दुर्गापुर के पुलिस उप महानिरीक्षक श्री देवव्रत भट्टाचार्य द्वारा की गई। कार्यक्रम में दुर्गापुर के लब्धप्रतिष्ठित न्यूरो सर्जन डा0 हार्दिक राजगुरू , डा0 रोहित कुमार एवं स्टेशन अस्पताल, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के पुलिस उप महानिरीक्षक(चिकित्सा) डा0 गयासूद्दीन द्वारा परिवार जनों एवं वरिष्ठजनों लिए फ्री चिकित्सा जॉंच की गई एवं मेडिकल कैम्प का आयोजन किया गया। इसमें उनकी पूरी मेडिकल टीम उपस्थित थी। कार्यक्रम में काफी लोगों ने भाग लिया एवं चिकित्सा जॉंच का लाभ उठाया। डा0 हार्दिक राजगुरू ने इस दौरान हार्ट अटैक के बारे में एवं न्यूरो प्राबलेम/तंत्रिका तंत्र से होने वाली बीमारियों के बारे में बड़े ही सूक्ष्मता से लोगों को समझाया। श्री देवव्रत भट्टाचार्य पुलिस उप महानिरीक्षक एवं डा0 गयासूद्दीन द्वारा वरिष्ठजनों को अंगवस्त्र, पुष्प-गुच्छ एवं उपहार प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर श्री देवव्रत भट्टाचार्य ने कहा कि साल 1993 में यू0एन0 जनरल असेंबली ने एक संकल्प के द्वारा 15 मई को विश्व परिवार दिवस मनाने की तारीख् तय की थी। पहली बार विश्व परिवार दिवस 1994 में मनाया गया।इसके बाद हर साल 15 मई को विश्व परिवार दिवस मनाया जाने लगा। विश्व परिवार दिवस मनाने की शुरूआत करने के पीछे की वजह दुनियाभर के लोगों को परिवार से जोड़े रखना और परिवार से जुड़े मुद्दो पर समाज में जागरूकता फैलाना था। परिवार अलग अलगत विचार, पसंद के लोगों को एकजुट करता है। लोगों के आपसी मतभेदों को भुलाकर प्रेम से रहने के लिए प्रेरित करता है और भावनात्मक तौर पर परिवार एक दूसरे का सहारा देने व अकेलेपन को दूर करने काम परिवार ही करता है। आज के आधुनिक युग में परिवार में सबसे अधिक उपेक्षा वृद्धजनों की हो रही है। आज संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। एकल और व्यक्तिगत परिवार का चलन है। मॉ-पिता को हम वो सम्मान नहीं दे पा रहे हैं, जिसके वो वास्तविक हकदार हैं। हमेु याद रखना होगा कि हम सभी का जीवन हमारे माता- पिता की देन ही हैं. ईश्वर द्वारा प्रदत्त बेशकीमती उपहारों में से एक हमारे माँ बाप होते हैं. हमें अपने जीवन के प्रत्येक मोड़ पर उनके साथ और आशीर्वाद की जरूरत रहती हैं.हमारा भी उनके प्रति दायित्व हैं कि हम अपने माता-पिता का सम्मान करें उनकी केयर करें. हमारे माता-पिता सदैव हमारी सफलता और सम्रद्धि की कामना करते हैं. हमारी ख़ुशी और सफलता में ही उनकी ख़ुशी दिखती हैं. अपने जीवन के सर्वोच्च सुखो का बलिदान देकर यहाँ तक कि स्वयं भूखे पेट सोकर माँ बाप अपनी सन्तान का पालन पोषण करते हैं.एक बालक के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण योगदान माता-पिता का होता हैं, भले ही वे बालक बड़े होकर उनका सम्मान आदर व सेवा करे या नहीं करें. हमारी भारतीय सनातन संस्कृति प्रत्येक बालक को अपने माता-पिता के प्रति सम्मान करने, के संस्कार देता हैं.निसंदेह मैं और आप आज जो कुछ भी हैं वह हमारे माता-पिता की देन हैं, हमारी कामयाबी और जीवन के इस सफर में बूढ़े माँ बाप ने हाडतोड़ पसीने की कमाई की बदौलत हैं. उनका ऋण सम्भवतया कभी अदा नहीं किया जा सकेगा. फिर भी एक पुत्र या पुत्री के रूप में हमें अपने कर्तव्यों/ दायित्वों का भली प्रकार के निर्वहन करना चाहिए. ये ओल्ड ऐज होम की व्यवस्था कभी भी हमारे समाज का अंग नहीं थी. असहाय हालात में वृद्ध माता-पिता को घर से लज्जित कर निकाल दिया जाता हैं, इन्हें बोझ समझकर आज के युवा अपनों से दूर होते हैं.हमारे माता पिता अपनी समस्त आशाएं अपनी सन्तान से लगा देते हैं, कि हमारा बेटा/ बेटी बड़ा होगा तो हम सुकून से जी सकेगे. मगर औलादे पैरों पर खड़ी होने पर अपने कर्ज को पूरा करना तो दूर उन्हें सम्मान से जीवन जीने भी नहीं देती हैं.एक सन्तान के रूप में हमारे कर्तव्य बालपन से ही शुरू हो जाते हैं जो आजीवन चलते रहते हैं. उनका सम्मान हमें हर स्थिति में करना चाहेगा.यह बात कभी किसी को सिखाई नहीं जा सकती कि आपकों अपने बड़ों, वृद्धों या माता -पिता का सम्मान किस तरह करना चाहिए. यह व्यक्ति के उनके प्रति नजरिये पर निर्भर करता हैं और वह वास्तविक व्यवहार भी उसी के अनुरूप कर सकेगा. बताने के लिए ऐसी हजारों बाते हो सकती हैं जो आपकों अपने माता पिता के सम्मान में करनी चाहिए, मगर औपचारिकता के दायरे से बाहर आकर हमें दिल से उनके लिए कुछ करना चाहिए क्योंकि वो उस सम्मान रिस्पेक्ट के हकदार हैं.


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